50 साल बाद कैसा होगा भारत? बस यह एक सवाल बताएगा—5 जीवित बाबा या 5 जीवित वैज्ञानिक?
केवल एक सवाल आपको यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि 50 साल बाद भारत कैसा होगा।
किसी से बस इतना पूछिए—
पहले पाँच नाम शायद तुरंत याद आ जाएँ। लेकिन दूसरे पाँच नाम बताते समय शायद हमें रुककर सोचना पड़े।
यही इस सवाल की असली ताकत है।
यह सवाल किसी बाबा को गलत और वैज्ञानिक को सही साबित करने के लिए नहीं है। सवाल इससे कहीं ज्यादा गहरा है—
हमारी याददाश्त क्या कहती है?
हम उन लोगों के नाम आसानी से याद रखते हैं जो लगातार हमारे सामने दिखाई देते हैं— टीवी पर, सोशल मीडिया पर, धार्मिक आयोजनों में, भाषणों में या इंटरनेट पर।
लेकिन जो लोग वर्षों तक प्रयोगशालाओं में बैठकर शोध करते हैं, नई तकनीक विकसित करते हैं, बीमारियों पर शोध करते हैं, अंतरिक्ष और ऊर्जा के क्षेत्र में काम करते हैं या मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देते हैं—उनके नाम कितने लोग जानते हैं?
यहाँ समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, हमारी सामूहिक प्राथमिकता की है।
हम अक्सर परिणाम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन परिणाम पैदा करने वाले दिमाग को भूल जाते हैं।
मोबाइल चाहिए, इंटरनेट चाहिए, इलाज चाहिए, आधुनिक मशीनें चाहिए, अंतरिक्ष की उपलब्धियाँ चाहिए— लेकिन इन्हें संभव बनाने वाले वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के नाम जानने में हमारी रुचि कितनी है?
आस्था जरूरी है, लेकिन सवाल भी जरूरी है
भारत की परंपरा में आध्यात्मिकता का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। संत और आध्यात्मिक शिक्षक लोगों को जीवन, नैतिकता, अनुशासन और आत्मचिंतन की दिशा दे सकते हैं।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब आस्था सवाल पूछने की क्षमता को कमजोर कर देती है।
विज्ञान की खूबसूरती ही यही है कि वह कहता है—
“सवाल पूछो। प्रमाण मांगो। जांचो। फिर स्वीकार करो।”
एक स्वस्थ समाज को दोनों की जरूरत हो सकती है— आध्यात्मिकता से भीतर की दिशा और विज्ञान से बाहर की दुनिया को समझने की क्षमता।
लेकिन अगर समाज प्रश्न पूछने के बजाय केवल मानने लगे, तो उसकी प्रगति की गति धीमी पड़ सकती है।
असली सवाल 50 साल बाद के भारत का है
आज हम जिस पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं, वही अगले 50 वर्षों का भारत बनाएगी।
अगर बच्चों के आदर्श केवल प्रसिद्ध चेहरे होंगे, तो वे प्रसिद्धि का पीछा करेंगे।
अगर उनके आदर्श ज्ञान, शोध, खोज, मेहनत और समस्या-समाधान करने वाले लोग होंगे, तो शायद वे समस्याओं के समाधान खोजेंगे।
यह भी तय करेगा कि हमारे नागरिक कितना सोचते हैं, कितना प्रश्न करते हैं और कितनी आसानी से किसी बात को सच मान लेते हैं।
इसलिए अगली बार जब कोई आपसे यह सवाल पूछे—
तो इसे सामान्य ज्ञान का सवाल मत समझिए।
इसे अपने समाज का आईना समझिए।
क्योंकि जिस समाज को अपने मनोरंजन और प्रसिद्ध चेहरों के नाम याद रहते हैं, लेकिन ज्ञान पैदा करने वालों के नाम याद नहीं रहते, उसे अपने भविष्य के बारे में थोड़ा गंभीर होकर सोचना चाहिए।
50 साल बाद भारत कैसा होगा, इसका जवाब शायद भविष्य में नहीं— आज हमारी प्राथमिकताओं में छिपा हुआ है।
और सबसे तीखा सवाल अंत में यही है—
“हम आने वाली पीढ़ी को क्या दे रहे हैं— सिर्फ विश्वास करने की आदत, या सवाल पूछने का साहस भी?”

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